01/10/2018 - नेशनल - आरती सिंह

गांधी जयंती पर विशेष: जब गांधी का विनम्र स्वभाव लोगों को अपनी तरफ खींच रहा था

mahatma gandhi jayanti

कल है 2 अक्टूबर यानि की गांधी जयंती। बापू का व्यक्तित्व उनकी सादगी सबको अपनी ओर खींचती रही है ऐसे में आज हम आपको कुछ ऐसे लोगों के अनुभवों के बारे में बताएंगे जो महात्मा गांधी से व्यक्तिगत रूप से मिल चुके है…

राधेश्याम गुप्ता

मैं हूं राधेश्याम गुप्ता उम्र है 101 साल जब मैंने गांधी को देखा तो उस वक्त हमारा परिवार लुधियाना के चौड़ा बाजार स्थित मइया दी गली में रहता था। हमें पता चला कि महात्मा गांधी नमक आंदोलन के तहत लुधियाना आ रहे हैं। किशोरावस्था थी इस वजह से हम 7 – 8 दोस्तों संग चौड़ा बाजार पहुंच गए। वहीं से गांधी जी की यात्रा आरंभ करनी थी। देखा कि धोती पहने बापू लाठी थामे तेजी से चले आ रहे हैं। बिलकुल दुबले – पतले। उनके शरीर की हड्डियां तक गिनी जा सकती थीं,लेकिन बेहद विनम्र। उनका विनम्र स्वभाव लोगों को अपनी तरफ खींच रहा था। उन्हें देखते ही लोगों ने नारे लगाने शुरू कर दिए।

मैं और मेरे दोस्तों ने भी इंकलाब जिंदाबाद के नारे जोर – जोर से लगाए। उसके बाद गांधी जी चौड़ा बाजार से चौड़ी सड़क होते हुए गोशाला तक पहुंचे। तेजी से मार्च करते हुए। वह बहुत तेजी से चलते थे। वे आगे-आगे और हम उनके पीछे-पीछे चलते रहे। उस समय हमें नमक सत्याग्रह की उतनी जानकारी नहीं थी, लेकिन बापू के पीछे हम नारे लगाते चलते रहे।

रास्ते में लोग बापू को रोक कर प्रणाम करते रहे। कुछ लोग हार लेकर खड़े थे। गले में हार डालते रहे। बापू के जाने के बाद हम लोगों ने विदेशी सामान का बहिस्कार शुरू कर दिया। मुझे याद है उस समय अंग्रेजों द्वारा विदेश से मोमबत्ती मंगवा कर बेची जाती थी। दिवाली से एक दिन पहले लोग एक – दूसरे से कह रहे थे कि हमे इन मोमबत्तियों को नहीं खरीदना है।

लाभ सिंह कादियान

वहीं लाभ सिंह कादियान ने बताया कि वह 04 दिसंबर 1947 का दिन था। मेरी उम्र 14 वर्ष थी। पांचवी कक्षा में पढता था। शाम के चार बजे गांधी जी को पानीपत में सभा के बाद दिल्ली जाना था। सिवाह में कुछ बसअड्डा के पास लोग उनका आदर – सत्कार करने के लिए एकत्र होने लगे। तीन चार दरिया बिछी हुई थीं। जाड़े के दिन थे तो शाम भी जल्द ढल गई। रात के नौ बज गए। गांधीजी के आने में देरी हुई तो लोग बेचैन होने लगे। तभी हाथ में एक लाठी, आंखों पर चश्मा व कमर में धोती बांधे गांधीजी पहुंचे। हालांकि 5 – 6 मिनट के लिए ही रुके। कांग्रेस कार्यकर्ता लाल गुलाब सिंह ने माला पहना कर उनका स्वागत किया। छोटी सी सभा में उन्होंने कहा, अब हमें देश को आजाद रखना है। आपस में सदभावना बनाए रखें।

विष्णुदेव नारायण

मैं विष्णुदेव नारायण सिंह हूं। 1946 में जहानाबाद में गांधीजी को देखा, सुना। वे सभा को संबोधित करने के लिए आए थे। कचहरी के पास बड़ा मैदान खचाखच भीड़ से भरा हुआ था। चारों तरफ से अंग्रेजी हुकूमत के सिपाही भीड़ को घेरे हुए थे। चौकी का मंच बनाया गया था। टीन के बने भोंपूनुमा माइक से गांधीजी आमसभा को संबोधित कर रहे थे।

डॉ.रामनिरंजन परिमलेंदु

मैं डॉ. रामनिरंजन परिमलेंदु हूं। मैंने जब गांधी को देखा, वह 1947 के अगस्त महीने के बाद का समय था। बिहार में भी सांप्रदायिक दंगे हुए। गांधीजी शांति की स्थापना का प्रयास कर रहे थे। इसी सिलसिले में वे बाढ़ के वीटीएच स्कूल के मैदान में आये। उस दिन काफी आंधी – तूफान था और बारिश हो रही थी। हमारे पिताजी बाढ़ के थाना प्रभारी हुआ करते थे। उन्होंने सभी को घर से निकलने को मना कर दिया था। लेकिन, अवहेलना ही कह लीजिए, मैं गांधी जी को देखने स्कूल चला गया। मैदान में एक मंच बना था, जिस पर दो – तीन चौकी लगी थी। चौकी पर खादी की चादर बिछाई गई थी। एक माइक भी था। गांधी जी आए और सबसे पहले प्रार्थना हुई। प्रार्थना के बाद उन्होंने लोगों को संबोधित किया। उन्हें देख कर पहली अनुभूति हुई – आध्यात्मिक शांति की।

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